Saturday, August 2, 2008
चरित्र
साधु ने स्वप्न देखा कि दोनों हाथों में ऊँचे डंडे ल्रकर वह मोक्षमहल की उपरी मंजिल पर चढ़ने का प्रयास कर रहा है, किंतु चढ़ने में असफल रहता है। कुछ समझ में नही आता की क्या करे। पास ही में खड़े एक बुजुर्ग ने देखा तो वे हँसने लगे और साधु से पूँछा की वे क्या कर रहें? साधू ने कहा-मेरे पास सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन के दो डंडे है, इनके सहारे मोक्षमहल की ऊपरी मंजिल पर जाना चाहता हूँ, किंतु चढ़ नही पाता, कृपया आप ही मार्गदर्शन करे। बूढे ने कहा-स्वामी जी सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन के दो डंडो में जब तक सम्यक चारित्र्य की आड़ी सीढियाँ न लगाओगे, तब तक किस पर पैर रख कर ऊपर बढ़ सकोगे। आख़िर टिकने के लिए कुछ तो अवलंबन चाहिए। बिना चरित्र के ज्ञान, कर्म, दर्शन, भक्ति, साधना-उपासना सब कुछ अपूर्ण है। मोक्ष तो नितांत असंभव है।
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