एक सधा हुआ ऊंट था। नक्कारखाने का कोई उत्सव होता तो उसकी पीठ पर नगाडा लादकर चोबेदार उसे बजाता हुआ चलता। ऊंट बहुत बूढा हो गया। काम का न रहा तो उसे खुला छोड़ दिया गया। राजा का होने से कोई उसे मारता न था। ऊंट एक दिन किसी बुढिया के सूखते हुए अनाज को खाने लगा। बुढिया ने सूप बजाकर भगाना चाहा। ऊंट ने कहा- " जन्म भर नगाडो़ की आवाज सुनता रहा हूँ। तुम्हारे सूप से क्या डरने वाला हूँ। "
तथाकथित सत्संगियों पर किसी की शिक्षा का असर नही पड़ता। आयु बीत जाने पर भी सारे जीवन भर के संस्कार छाए रहते हैं। उससे उबरने की सोचें तो जीवन को दिशा भी मिले।
Friday, August 1, 2008
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