Wednesday, September 10, 2008

उपदेश की योग्यता

एक बालक मिठाई बहुत खाता था, उसकी यह आदत उसके स्वास्थ्य को बिगाड़ रही थी। बालक मानता नहीं था। निदान के लिए उसकी माता उसे रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा का अधिक प्रभाव पड़ने की आशा से उनके पास ले गई और प्रार्थना की कि आप इसे उपदेश देकर मिठाई खाना छुड़ा दें। परमहंस ने उसे एक सप्ताह बाद आने को कहा। महिला चली गई। एक सप्ताह बाद आई, तब उन्होंने बालक को उपदेश दिया और उसने मिठाई छोड़ भी दी।
महिला ने एक सप्ताह विलंब लगाने का कारण पूछा, तो परमहंस ने कहा, तब तो मैं मिठाई स्वयं खाता था। जब बालक को उपदेश देना आवश्यक प्रतीत हुआ, तो पहले मैंने स्वयं मिठाई छोड़ी , तब बालक को कहा। जो करता है, उसी की शिक्षा का प्रभाव भी पड़ता है।
यह प्राथमिक आवश्यकता है कि व्यक्ति पहले अपने चिन्तन को देखे। लोकसेवी व सत्साहस हेतु संघर्ष करने के लिए आगे आने वाले के लिए तो यह एक अनिवार्य प्रक्रिया है।

Sunday, September 7, 2008

आपका अनन्य भक्त

देवता वरदान बॉंटने धरती पर आए, तो लोगों की अपार भीड़ अपनी-अपनी मनोकानाएं लेकर आ जुटी। किसी ने यष माँगा, किसी ने धन, किसी ने पद तो किसी ने कुछ और। देवता सबकी वांछित मनोकामनाएं पूरी करते चले गए। एक विद्रुप सा व्यक्ति हाथ जोड़े कोने में खड़ा था। देवता ने पास बुलाकर कहा-``तात् ! तुम्हें भी जो कुछ माँगना हो, माँग लो।
उसने कहा-`` मेरी याचना तो छोटी सी है। जिन लोगों ने धन माँगा हैं, उनके पते मुझे बताने की कृपा करें। फिर मैं अपनी मनोकामना स्वयं ही पूरी कर लूँगा।´´
देवता ने आश्चर्य से पूछा-`` आखिर तुम हो कौन ? ´´ उस व्यक्ति ने कहा-`` व्यसन, अनावश्यक धन को विकेंद्रित करने में संलग्न आपका अनन्य भक्त।´´

Saturday, September 6, 2008

क्रिया की प्रतिक्रिया

एक लड़का जंगल में गया हुआ था। चारों ओर सुनसान, उस बियाबान जंगल में हवाओं और पेड़ों के झूमने की ही आवाज आती थी। वह लड़का डरा और चिल्लाया, ` भूत।´ तो उसकी आवाज पहाड़ियों से टकराकर लौट आई और उसे सुनाई दिया, `भूत।´ लड़का समझा सचमुच भूत है। अब की बार उसने मुटि्ठयॉं कसीं और जोर से चिल्लाया, `` तू मुझे खायेगा।´´ पहाड़ो से टकराकर उसकी आवाज फिर लौट आई और उसने यही समझा कि भूत मुझसे पूछ रहा है। तब वह बोला, `` हॉं मैं तुझे खाउंगा।´´ यही आवाज जब फिर उस तक लौटी तो लड़का डरकर अपने घर चला गया और उसने अपनी मॉं से सारी बात कह दी। मॉं ने वस्तुस्थिति समझकर कहा, `` बेटा अब की बार तुम जंगल में जाओ तो उस भूत से कहना मेरे प्यारे दोस्त मैं तुझे प्रेम करता हूं। दोबारा जब वह जंगल में गया तो चिल्लाया,`` मेरे अजीज दोस्त।´´ पहाड़ों से उन्ही शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई दी और लड़के ने समझा, इस बार भूत उसे डरा नहीं रहा है। फिर वह बोला `` मैं तुझे प्यार करता हूँ।´´ पहाड़ो से यही बात फिर टकराकर लौटी तो लड़का खुशी से नाच उठा। क्रिया की प्रतिक्रिया प्रकृति का एक शाष्वत नियम है।

Thursday, September 4, 2008

दृढ़ संकल्प

कालिदास एक गया-बीता व्यक्ति था, बुद्धि की दृष्टि से शून्य एवं काला-कुरुप। जिस डाल पर बैठा था, वह उसी को काट रहा था। जंगल में उसे इस प्रकार बैठे देख राज्यसभा से विद्योत्तमा द्वारा अपमानित पंडितों ने उस विदुषी को शास्त्रार्थ में हराने व उसी से विवाह कराने का षडयंत्र रचने के लिए कालिदास को श्रेष्ठ पात्र माना। शास्त्रार्थ में अपनी कुटिलता से उसे मौन विद्वान बताकर उन्होंने प्रत्येक प्रश्न का समाधान इस तरह किया कि विद्योत्तमा ने उस महामूर्ख से हार मान उसे अपना पति स्वीकार कर लिया। पहले ही दिन जब उसे वास्तविकता का पता चला तो उसने उसे घर से निकाल दिया। धक्का देते समय जो वाक्य उसने उसकी भत्र्सना करते हुए कहे , वे उसे चुभ गये। दृढ़ संकल्प अर्जित कर वह अपनी ज्ञान वृद्धि में लग गया। अंत में वही महामूर्ख अपने अध्ययन से कालांतर में ``महाकवि कालिदास´´ के रुप में प्रकट हुआ और अपनी विद्वता की साधना पूरी कर विद्योत्तमा से उसका पुनर्मिलन हुआ।

Monday, September 1, 2008

रोगोपचार

एक रोगी राजवैद्य शार्गंधर के समक्ष अपनी गाथा सुना रहा था। अपच, बेचैनी, अनिद्रा, दुर्बलता जैसे अनेक कष्ट व उपचार में ढेरों राशि नष्ट कर कोई लाभ न मिलने के कारण की वह राजवैद्य शार्गंधर के पास आया था। वैद्यराज ने उसे संयमयुक्त जीवन जीने व आहार-विहार के नियमों का पालन करने को कहा। रोगी बोला, `` यह सब तो मैं कर चुका हूँ । आप तो मुझे कोई औषधि दीजिए, ताकि मैं कमजोरी पर नियंत्रण पा सकूँ । पौष्टिक आहार आदि भी बना सकें तो ले लूंगा, पर आप मुझे फिर वैसा ही समर्थ बना दीजिए।´´ वैद्यराज बोले, `` वत्स ! तुमने संयम अपनाया होता तो मेरे पास आने की स्थिति ही नहीं आती। तुमने जीवनरस ही नहीं, जीने की सामर्थ्य एवं धन-संपदा भी इसी कारण खोई है। बाह्योपचारों से, पौष्टिक आहार आदि से ही स्वस्थ बना जा सका होता तो विलासी-समर्थों में कोई भी मधुमेह-अपच आदि का रोगी न होता । मूल कारण तुम्हारे अंदर है, बाहर नहीं। पहले अपने छिद्र बंद करो, अमृत का संचय करो और फिर देखो वह शरीर निर्माण में किस प्रकार जुट जाएगा।´´ रोगी ने सही दृष्टि पाई और जीवन को नए सॉंचे में ढाला। अपने बहिरंग व अंतरंग की अपव्ययी वृतियों पर रोक-थाम की और कुछ ही माह में स्वस्थ समर्थ हो गया।