Thursday, July 31, 2008

नौकर और मुंशी

एक बादशाह का एक बहुत ही मुंह लगा नौकर थावह दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता थाएक दिन उसे विचार आया की वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता, तब भी उसे केवल पॉँच रुपये ही मिलते हैं और मीर मुंशी जो कभी कुछ नही करता पॉँच सौ रुपये वेतन पाता हैंइस भेद का क्या कारण हैं ? उनने अपनी यह उलझन बादशाह को कह सुनाईबादशाह ने हँसकर कह दिया-किसी दिन मौके पर बतलाऊंगा

एक दिन घोडो का काफिला उसकी सीमा से गुजराबादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम कर यह काफिला कहाँ जा रहा हैं ?

नौकर गया और आकर बतलाया की हुजुर वह काफिला सीमा के कंधार देश जा रहा हैं

अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजाउसने आकर बतलाया कि यह काफिला काबुल से रहा हैं और कंधार जा रहा हैंउसमे पॉँच सौ घोडे और बीस ऊंट भी हैंमैंने अच्छी तरह पता लगा लिया हैं कि वे सब सौदागर हैं और घोडे बेचने जा रहे हैंखरीदना चाहे तो कम कीमत पर मिल सकते हैंमैंने पचास ऐसे घोडो को छांट लिया हैं, जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम नस्ल के हैंबादशाह ने तुंरत ही पचास घोडे खरीद लिये, जिससे उसे कम दामो पर अच्छे घोडे मिल गएकाफिले के विषय मे चिंता जारी रही और उन परदेशी सोदागरो पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ाबादशाह ने नौकर से कहा-देखो तुम्हे पॉँच रूपये क्यों मिलते हैं और मीर मुंशी को पॉँच सौ क्यों ? नौकर ने इस अन्तर के रहस्य को समझा और सदा के लिए सावधान हो गया